Poem: 💙 बचपन 💙
लौटा दो वो लम्हे, जब कंधो पे बस्ता टांगे हम डामाडोल हुए क्लासरूम की तरफ चला करते थे, जब स्कूल से आकर घर वापस हम अक्सर सो जाया करते थे , जब होमवर्क की टेंशन नहीं पर खेलने जाना ज़रूरी था , जब पेंसिल से लिखी गलतिया हम झट से मिटा दिया करते थे, लौटा दो वो लम्हे जब हम छोटे बच्चे हुआ करते थे, ना क्लास में फर्स्ट आने की दौड़ थी , ना किसी बात की चिंता , ना थी कोई दूरी किसी से , ना रूठा करते थे हम किसी से , लौटा दो वो लम्हे जब हम बेफिरक जीया करते थे , भोली सी मुस्कान में सब बया करते थे , आँखों में हम कभी आंसू ना कैद किया करते थे , जो मन हुआ वो कह दिया करते थे, लौटा दो वो लम्हे जब हम बेबाक सब कहा करते थे , मम्मी से ज़िद्द भी वो मासूम थी, पापा कभी डाटा नहीं करते थे , भोलेपन में हमारे वो भी अपना बचपन जीया करते थे , जब रविवार का हर दिन पिकनिक हुआ करता था , लौटा दो वो लम्हे मेरे हिस्से के शायद आज उन्हें फिर जीने का मन है, तब शायद कुछ कसर बच गयी थी , जिसे आज पूरी करने की तमना हम करते है। - Ira Pandey.