Poem: चार यार
मैं बैठी डरी इस ख्याल से थी की,
हाथ जिनका थाम कर हर पल हसी हूँ मैं,
अब उहने छोड़ कर मुझे आगे बढ़ना है।
यही चार दिन यारी के मुझे ज़िन्दगी भर साथ इन्हे रखना है
वो यारो ने भी खूब की है आदत ख़राब हमारी
दुनिया से जो लाडे थे।
वो आंसू हमारे देखके
सबकुछ छोड़ हमारे पास बैठे थे।
आज भी ज़रा ख्याल उनका आँखे नम करदेता है।
वो शमां भी हसीं थी
जब उनके साथ बैठ कर
उनकी जाने की बात पर हँसा करते थे।
ये शमां भी हसीं है
जब उनकी यादो को साथ बैठे हम
हर लफ्ज़ पन्नो पे उतारा करते है।
वो चार दिन यारी के
ताउम्र हमे याद रहेंगे।
राहे जब अलग करेंगी
समय की मार भी भारी रहेंगी
तब वादा करो की चाय के साथ हमेशा हमे याद करोगे।
जो रह गए पीछे
उनके नाम भी बाते है।
शुक्रिया है उनको, दुनिया में कदम रखने से पहले ही
दुनिया दारी वो सिखा के चले गए।
वो जगह बहुत प्यारी थी ,
यहाँ मिले थे चार यार हमारे।
चार दिन की यारी के चार हज़ार खत वो दे गए
आज भी जब उन खतो को खोला तो वो चार यार याद आ गए।
खेलते, हस्ते, गाते वो समय कभी बिताया था।
मन तो आज भी है
की उन यारो के साथ,
वो चार दिन कुछ और जी लिए जाए।
कुछ खत पलो के और लिखुँ,
कुछ बाते और हो जाए।
इस शाम की सुबह ना हो और ये शाम यही ही चलती जाए।
-Ira Pandey
Just a word "Khubsurat" :-)
ReplyDeleteWah, bahut badhiya. Keep writing
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