Poem: कुछ कहानियाँ
कागज़ के पन्नो पे लिखी उन हज़ारो कहानियो में एक तुम भी हो।
मेरी ज़िन्दगी को इस क़दर बदलने के लिए शुक्रिया।
शायद तुम्हारे आने और जाने में बहुत कुछ सीखने को मिला है मुझे।
तुम्हारे होने पर अच्छा लगता था, एक समय वो भी था।
आज तुम्हारे जाने का भी कोई अफ़सोस नहीं।
हज़ारो पन्नो की उस किताब से एक तुम्हरी कहानी गुम भी हो जाए तो शायद ही फर्क पड़े मुझे।
ये कहानी हमने लिखी थी, हमने ही मिटा दी।
रेत पे लिखी कहानिया अक्सर पानी एक बहाव से ख़तम हो जाती है ,
शायद हमारी कहानी भी कुछ ऐसी थी।
अगर सियाही से लिखते ये कहानी तो शायद कुछ देर और पढ़ पाते।
एक कहानी और है मेरी इस किताब में।
सबसे लम्बी कहानी है जो, एक पन्ना नहीं शायद आधी किताब की है वो कहानी।
जैसे किसी ने पत्थर पे लकीर सी बना दी हो।
एक कहानी जो दुनिया कभी ना पढ़ पाएगी।
एक कहानी जिसे सादिया याद रख जाएगी।
शायद ना तुम कभी समझ पाए इस कहानी को ,
शायद तुम समझाना ही नहीं चाहते थे इस कहानी को।
एक कहानी थी तुम , एक कहानी है वो।
बस इतना है की तुम रेट पे लिखी थी और वो....
शायद कागज़ पे सियाही से या ,
शायद पत्थर पे गड़ी उस लकीर जैसे।
काश तुम समझती , तो शायद कुछ और पल रुक जाती।
पर अब जब तुम नहीं हो, गिला नहीं है तुमसे कोई शिखवा नहीं।
ख़ुशी थी तुम्हारे आने की, पर तुम्हारे जाने का गम नहीं।
शायद और काश की ये कहानी थी ,
एक डोर हमने तब थामी थी।
एक सिरा जब तुमने छोड़ दिया , हमने करीने से संभाल के दूसरा सिरा रख लिया।
तुम्हारा घमड़ था या बेरुखी ,
जब झटक दी वो डोर तुमने , उसमें पोए मोती भी बिखर गए।
-Ira Pandey
मेरी ज़िन्दगी को इस क़दर बदलने के लिए शुक्रिया।
शायद तुम्हारे आने और जाने में बहुत कुछ सीखने को मिला है मुझे।
तुम्हारे होने पर अच्छा लगता था, एक समय वो भी था।
आज तुम्हारे जाने का भी कोई अफ़सोस नहीं।
हज़ारो पन्नो की उस किताब से एक तुम्हरी कहानी गुम भी हो जाए तो शायद ही फर्क पड़े मुझे।
ये कहानी हमने लिखी थी, हमने ही मिटा दी।
रेत पे लिखी कहानिया अक्सर पानी एक बहाव से ख़तम हो जाती है ,
शायद हमारी कहानी भी कुछ ऐसी थी।
अगर सियाही से लिखते ये कहानी तो शायद कुछ देर और पढ़ पाते।
एक कहानी और है मेरी इस किताब में।
सबसे लम्बी कहानी है जो, एक पन्ना नहीं शायद आधी किताब की है वो कहानी।
जैसे किसी ने पत्थर पे लकीर सी बना दी हो।
एक कहानी जो दुनिया कभी ना पढ़ पाएगी।
एक कहानी जिसे सादिया याद रख जाएगी।
शायद ना तुम कभी समझ पाए इस कहानी को ,
शायद तुम समझाना ही नहीं चाहते थे इस कहानी को।
एक कहानी थी तुम , एक कहानी है वो।
बस इतना है की तुम रेट पे लिखी थी और वो....
शायद कागज़ पे सियाही से या ,
शायद पत्थर पे गड़ी उस लकीर जैसे।
काश तुम समझती , तो शायद कुछ और पल रुक जाती।
पर अब जब तुम नहीं हो, गिला नहीं है तुमसे कोई शिखवा नहीं।
ख़ुशी थी तुम्हारे आने की, पर तुम्हारे जाने का गम नहीं।
शायद और काश की ये कहानी थी ,
एक डोर हमने तब थामी थी।
एक सिरा जब तुमने छोड़ दिया , हमने करीने से संभाल के दूसरा सिरा रख लिया।
तुम्हारा घमड़ था या बेरुखी ,
जब झटक दी वो डोर तुमने , उसमें पोए मोती भी बिखर गए।
-Ira Pandey
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